नमस्कार मित्रो मैं हु अजीत यादव मैने इस लेख के माध्यम से बताया हूँ कि साल 2025 में इस बार गोवर्धन पूजा कब मनाया जाएगा। जानिए पूजा की सही तिथि क्या होगी, पूजा करने की विधि क्या रहेगी और गोवर्धन पूजा की कथा के बारे में जानेगे आईये जानते हैं।
Govardhan Puja 2025 Date And Time: मित्रो गोवर्धन का पर्व कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (प्रथम) को मनाया जाता है। इसमें गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। गिरिराज शब्द का अर्थ होता है विश्व के सभी पर्वतो का राजा। इस दिन मथुरा के निकट स्थित इस गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाने का बहुत अधिक महत्व है। मथुरा में इन्हें गिरिराज बाबा या गिर्राज बाबा के नाम से स्मरण किया जाता है।
इस दिन व्रत नही किया जाता है लेकिन इस दिन पक्की रसोई या किसी भी प्रकार का पकवान बनाना मना होता है। और केवल कच्ची रसोई बनाया जाता है। और इस दिन मिश्रित रसोई यानी सभी प्रकार की सब्जियों को मिलाकर बनाई जाती है। निसे गड्ड की सब्जी भी कहा जाता है। और रोटी बनाने की परम्परा है। कुछ लोग इस दिन कढ़ि रोटी कढ़ि बाजरा आदि भी बनाकर खाते है। वास्तव में यह उत्सव मौसम बदलने और बाजार में नया अन्न आने का प्रतीक है। इसलिए इसे अन्नकूट महोत्सव भी कहा जाता है।
गोवर्धन पूजा करने की विधि
गोवर्धन पूजा के दिन प्रातःकाल ही स्नान आदि से निवृत्त हो ले और यथा समय भोजन आदि बनाले। फिर आप भी भोजन ग्रहण करे इसके बाद में अपने घर के आंगन को भली तरह से साफ करले। फिर गाय का गोवर लेकर आये और उस गोबर के द्वारा आंगन में सावधानी पूर्वक धरती पर गोवर्धन के प्रतीक पुरुष का निर्माण करे।
फिर रात को मुहूर्त देखकर परिवार के समस्त लोग उस गिवर्धन के निकट एकत्रित हो और सभी लोग एक-एक करके उस पवित्र गोवर्धन की – रोली, चावल, फूल आदि से पूजा करें। प्रसाद के लिए – खीर, बतासे, मिठाई आदि रखले। फिर धूप, दीपक जलाकर पूजा करे। और कोई एक व्यक्ति गोवर्घन के पूजन की कथा को कहे और अन्य ब्यक्ति शांति के साथ मे सुने।
इसके बाद में आरती गाते हुए उन गोवर्धन भगवान की परिक्रमा लगाए – कुल सात परिक्रमा लगानी चाहिए। इसका कारण यह है कि – गोवर्धन के साथ कोस की परिक्रमा मानी जाती है। इसलिए यह सात परिक्रमाएं उन साथ कोस का प्रतीक है। फिर सभी लोग, जोर से जय जयकरा लगाए और गोवर्धन को प्रणाम करें।
इसके बाद में सभी लोग अपने से बड़ी आयु के लोगो का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद ले। इसके बाद में सभी लोग प्रसाद ग्रहण करे अगले दिन प्रातःकाल उस गोबर को – खेत, कच्ची, जमीन या गमलो में डाल देना चाहिये ताकि उसकी उपयोगी याद बन सके।
गोवर्धन पूजा का महत्व
गोवर्धन का पूजन करने वाले मनुष्य को अति उत्तम फल मिलता है। इस व्रत करने वाले मनुष्यों को सदबुद्धि का विकास होता है। और इनमें सभी प्रकार के सद्गुड आटे है। उसके सभी रोग दोष दूर हो जाते है और सुख सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। उस प्रकार से गोवर्धन भगवान का पूजन करने वाले मनुष्य जीवन के प्रयेक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होते है।
Govardhan Puja 2025 Date And Time: 2025 में गोवर्धन पूजा कब है?
| व्रत त्योहार के नाम | दिन व तारीख |
|---|---|
| गोवर्धन पूजा | 22 अक्टूबर 2025 – बुधवार |
| प्रतिप्रदा तिथि शुरू होगी | 21 अक्टूबर 2025 – शाम 05:54 बजे |
| प्रतिप्रदा तिथि समाप्त होगी | 22 अक्टूबर 2025 – रात 08:16 बजे |
| पूजा का शुभ मुहूर्त | सुबह 06:26 – सुबह 08:26 बजे |
| संध्या पूजा का शुभ मुहूर्त | दोपहर 03:29 – शाम 05:44 बजे |
| गोधूली पूजा मुहूर्त | शाम 05:44 – शाम 06:10 बजे |
| ब्रम्ह पूजा मुहूर्त | सुबह 04:45 – सुबह 05:35 बजे |
गोवर्धन पूजा का कथा
प्राचीनकाल में दीपावली के अगले दिन (कार्तिक मास की शुक्लपक्ष को) पूरे देश मे देवराज इंद्र की पूजा हुआ करती थी। फिर जब द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था, तब भी यही प्रथा प्रचलित थी। भगवान श्रीकृष्ण का बचपन मथुरा एवं उनके निकटव्रती क्षेत्री में हुआ व्यतीत हुआ था। जिन्हें सामुहिक रूप से ब्रज-मण्डल कहते है।
जब श्रीकृष्ण ने अपने बचपन मे लोगो को इन्द्र की पूजा के लिए तैयारी करते हुए देखा तो उन्होंने सबको समझाया कि – इस समय (कार्तिक मास में इंद्र की पूजा करने का कोई लाभ नही है। इस समय हमें इंद्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। क्योंकि – इस पर्वत से ही गायो और मनुष्यों का भरण पोषण करने वाली सामग्री प्राप्त होती है।
जब गाय और मनुष्यों का पोषण होगा – तभी देश की और सस्कृति की रक्षा तथा उन्नति हो सकेगी। इसलिए हमें इस पर्वत के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए। और उसका पूजन करना चाहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से सभी लोगो ने गोवर्धन पर्वत की पूजा बहुत अधिक उत्त्साह से की जब इंद्र को इस बात का पता लगा तो वह बहुत अधिक क्रोधित हुए।
और अपने ऐरावत हाथी पर वैठकर ब्रज मण्डल पर चढ़ आये। उनकी आज्ञा से बादलो से मुसलाधार जल बरसने लगा और ओले पड़ने लगा। और भयंकर आंधी चलने लगी। इससे ब्रज के लोग भयभीत हो गए और भगवान श्रीकृष्ण की शरण मे पहुचे तब श्रीकृष्ण ने अपने बाये हाथ की कनिष्ठिका अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया।
व्रज के सभी लोग आने पषुओं आदि के साथ उसी पर्वत के नीचे एकत्रित हो गए। और पुर्ण रूप से सुरक्षित हो गए इस प्रकार से ब्रज में लगातार सात दिनों तक वृष्टि होती रही और श्रीकृष्ण साथ दिनों तक पर्वत को इसी प्रकार धारण किये खड़े रहे। तब से भगवान श्रीकृष्ण का ही एक नाम गिरिराज धारण भी हो गया।
अंत मे इंद्र थक गए और उनकी गलती का अहसास हुआ उन्होंने वर्षा बन्द कर दी और गोवर्धन पर्वत के महत्व को समझा तब इंद्र- भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की और उनसे क्षमा मांगकर अपने लोक को चले गए। तब श्रीकृष्ण के कहने पर ब्रज के लोग अपने पशु आदि के साथ मे पर्वत के नीचे से निकलकर अपने घरों को चले गए और श्रीकृष्ण पर्वत को उसी स्थान पर ज्यो का त्यों रख दिया।
हे गिवर्धन महाराज ! हे भगवान श्रीकृष्ण ! जिस प्रकार से अपने ब्रज मण्डल निवासियों की भारी वृष्टि से रक्षा की। ठीक उसी प्रकार से हमारी भी सभी प्रकार की मुसीबतों से रक्षा करना और अपनी छत्र-छाया में हमको सदैव सुरक्षित रखना हमको सदैव सदमार्ग में भी प्रेरित करना।
