Navratri 2st Day Bramhacharini Puja Vidhi: नमस्कार मित्रो मैं हु मुकेश यादव मैने इस लेख के माध्यम से बताया हूँ कि नवरात्र के दुसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा कैसे करे। आरती कैसे करे, प्रसाद और भोग कैसे लगाए! आईये जानते है। नवरात्र का दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी पूजा विधि रंग और भूख नवरात्र पर्व माता दुर्गा के प्रति आस्था और विश्वास प्रकट करने वाला पर्व है। प्रत्येक वर्ष में चैत्र आषाढ़ आश्विन और माघ महीने में चार बार नवरात्र आती लेकिन उसे चैत्र और अश्विन माह के नवरात्र को प्रमुख माना जाता है। वहीं अन्य दो गुप्त नवरात्रि मानी जाती है नवरात्रि माता दुर्गा को समर्पित है। नवरात्रि में हर दिमाग के अलग-अलग स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है।
नवरात्र में मां को प्रसन्न करने के लिए भक्तजन व्रत और पूजा अनुष्ठान करते हैं। नवरात्र का दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। मां का यह रूप भक्तों को मनचाहा वरदान का आशीर्वाद लेता है। भगवान शंकर को पति रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी। और तपस्या के कारण देवी को तपश्चरिणी और ब्रह्मचारिणी के अनुसार इनकी पूजा से मैं तप त्याग वैराग्य सदाचार और संयम की वृद्धि होती है।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि
Navratri 2st Day Bramhacharini Puja Vidhi: नवरात्र के दिनों में सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहने मां ब्रह्मचारिणी की उपासना के समय पीले या सफेद वस्त्र पहने ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए उनका चित्र या मूर्ति पूजा स्थान पर स्थापित करें। अपने हाथों में फूल लेकर मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें। और प्रार्थना करें इसके बाद देवी को पंचामृत से स्नान कराएं। फिर अलग-अलग तरह के फूल अक्षत कुमकुम सिंदूर अर्पित करें। इसके अलावा कमल का फूल भी चढ़ाये अब मां के मंत्र ॐ ब्रह्मचारिणे नमः कम से कम 108 बार जप करें। और मां ब्रह्मचारिणी को चीनी और मिश्री पसंद है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप
मां के इस स्वरूप की बात करें तो मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप देवी ब्रह्मचारिणी का है जो कि पूरे रूप से ज्योतिमर्य है। कठिन तपस्या की वजह से मां के मुख पर अटूट तेज और आभामंडल विद्यमान रहता है। मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। मां को साक्षात ब्रह्म का स्वरूप माना जाता है। और यह देवी तपस्या की प्रति मूर्ति है। मां ब्रह्मचारिणी दुर्गा शिव स्वरूप गणेश जननी, नारायणी विष्णु माया और पूर्ण ब्रह्म स्वरूपिणी के नाम से प्रसिद्ध है।
मां ब्रह्मचारिणी के पसंदीदा भोग
मां ब्रह्मचारिणी के बारे में बात करे तो माता को दूध और दूध से बने व्यंजन अतिप्रिय है। इसलिए आप मां की पूजा के दौरान उन्हें दूध से बने व्यंजनों का भोग लगा सकते है। साथ ही मां को शक्कर का भोग भी प्रिय हैं।
इसलिए उन्हें चीनी मिश्री और पंचामृत का भोग लगाएं ऐसा करने से माता जल्दी प्रसन्न होती हैं। इसके बाद भगवान शिवजी की पूजा करें और फिर ब्रह्मा जी के नाम से जल्द फूल और अक्षत हाथ में लेकर ॐ ब्रह्मणे नमः कहते हुए इसे भूमि पर रखें। बता दे कि मां को दूध से बने व्यंजन भी अति प्रिय है। तो आप उन्हें दूसरे व्यंजनों का भोग लगा सकते हैं। इसके बाद मां की कथा और आरती करें। अंत मे भोग लगाकर प्रसाद सभी लोगों में वितरित करें।
मां ब्रम्हचारणी की आरती
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो। ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।
मां ब्रम्हचारणी की कथा
माँ ब्रह्मचारिणी की पावन कथा – यह मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप है जो तपस्या संयम और साधना का प्रतीक है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और ज्ञान जबकि चारणी का अर्थ है आचरण करने वाली इसलिए मां ब्रह्मचारिणी वह देवी है जो तप और साधना के मार्ग पर अग्रसर रहने वाली हैं। पुराणों के अनुसार यह स्वरूप माता पार्वती का ही है जब उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। मां ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है। जो तपस्विनी स्वरूप का प्रतीक है उनका तेजस्वी और शांत मुख मंडल साधकों को संयम और तपस्या की प्रेरणा देता है। मां ब्रह्मचारी का स्वरूप त्याग और कठिन तपस्या का परिचायक है। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक घोर तप किया प्रारंभ में वे केवल फल फूल खाकर तपस्या करती रही। फिर कई वर्षों तक केवल पत्तों पर जीवन यापन किया, इसके बाद उन्होंने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया, और कठोर व्रत धारण किए मां की यह तपस्या हजारों वर्षों तक चली, जिससे सभी देवता ऋषि मुनि और स्वयं ब्रह्मा जी भी प्रभावित हुए उनकी इस कठोर साधना के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया।
बाल्यकाल से ही माता पार्वती भगवान शिव को अपना पति मानती थी जब नारद मुनि ने उन्हें बताया कि पूर्व जन्म में वे सती थी और शिव जी को पुनः प्राप्त करने के लिए अब उन्हें कठोर तपस्या करनी होगी। तब माता ने संकल्प लिया कि वे हर कठिनाई सहकर भी अपने आराध्य शिव को पति रूप में प्राप्त करेंगी। फिर उन्होंने अपने राजसी सुखों का त्याग कर वन में जाकर कठिन तपस्या आरंभ की यह संकल्प उनकी अद्वितीय आस्था और समर्पण का प्रतीक था। माता ब्रह्मचारिणी की कठोर तपस्या देखकर देवता भी आश्चर्य चकित थे, उनकी आराधना इतनी प्रचंड थी कि समस्त लोकों में ऊर्जा का संचार होने लगा देवताओं ने भगवान विष्णु से अनुरोध किया कि वे माता पार्वती की परीक्षा ले। भगवान विष्णु ने स्वयं उनके धैर्य और समर्पण की परीक्षा ली और अंततः सभी देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे अपने तप से भगवान शिव को प्राप्त करेंगी। जब माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने का विचार किया। तब नारद मुनि ने उन्हें तपस्या का मार्ग बतलाया उन्होंने कहा कि कठोर तप और संयम के बिना भगवान शिव को प्राप्त करना कठिन होगा।
नारद मुनि के उपदेश को सुनकर माता ने वन में जाकर अपनी घोर तपस्या आरंभ कर दी उन्होंने कठिन व्रत धारण किए और योगियों के समान कठोर जीवन अपनाया मां की तपस्या इतनी कठिन थी कि संपूर्ण प्रकृति भी प्रभावित होगयी। वृक्षों ने फल फूल देने बंद कर दिए नदियां सूखने लगी और स्वयं देवता भी चिंतित हो उठे। धरती पर संतुलन बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान शिव से आग्रह किया कि वे माता की तपस्या को स्वीकार करें। माता की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समर्पण से प्रभावित हुए। उन्होंने माता ब्रह्मचारिणी को वरदान दिया कि वे ही उनके पति बनेंगे भगवान शिव के दर्शन पाकर माता का तप सफल हुआ। और वे गौरी रूप में पुनः राजमहल लौट आई आगे चलकर भगवान शिव और माता पार्वती जी का विवाह संपन्न हुआ। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से भक्तों को संयम धैर्य और तप की शक्ति प्राप्त होती है। उनकी कृपा से साधक को हर संकट में साहस और आत्मविश्वास प्राप्त होता है।
ऐसा माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से मां ब्रह्मचारिणी की उपासना करता है उसे सफलता वैवाहिक सुख और मोक्ष का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां ब्रह्मचारिणी हमें धैर्य और तपस्या का महत्व सिखाती हैं उनकी कथा से यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अटूट संकल्प और कठिन परिश्रम आवश्यक है। वे संदेश देती हैं कि सच्चे मन से की गई भक्ति और साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती अतः उसका शुभ फल अवश्य प्राप्त होता है।
इसलिए नवरात्रि के दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान कर साफ स्वच्छ वस्त्र धारण करें मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप जलाएं उन्हें सफेद पुष्प अर्पित करें और पंचामृत से अभिषेक करें। ओम ए सरस्वती नमः मंत्र या फिर ओम ब्रह्मचार्य नमः मंत्र का जाप करें और माता को फल दूध और मिश्री का भोग लगाकर आरती उतारें। ब्राह्मणों को या कन्याओं को भोजन कराकर प्रसाद वितरित करें, मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से साधक को अटूट विश्वास दृढ़ संकल्प और आत्मशक्ति प्राप्त होती है। उनकी आराधना से मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है।
