Ashad Gupt Navratri 2026 Date: दोस्तों आज हम इस लेख में बात करेंगे आषाढ़ गुप्त नवरात्रि साल 2026 में कब मनाई जाएगी? आषाढ़ गुप्त नवरात्रि कब शुरू होगी और कब समाप्त होगी? और आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में कलश स्थापना करने का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा? और दुर्गा अष्टमी व नवमी का पर्व कब मनाया जाएगा? तो चलिए बात करते हैं –
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की। हिंदू धर्म में नवरात्रि के पर्व का विशेष महत्व है। पूरे साल में चार नवरात्रि मनाए जाते हैं। अधिकांश लोग साल के दो नवरात्रियों के बारे में जानते हैं। यह नवरात्रि चैत्र और शारदीय नवरात्रि कहलाते हैं। लेकिन इन दोनों नवरात्रों के अलावा भी दो और नवरात्रि भी होते हैं जिन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।
यह गुप्त नवरात्रि माघ और आषाढ़ के महीने में आते हैं। आषाढ़ महीने यानी जुलाई और जुलाई में पड़ने के कारण इस नवरात्रि को आषाढ़ नवरात्रि कहा जाता है। यह आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर नवमी तिथि तक मनाई जाती है। दोस्तों, यह नवरात्रि भी नॉर्मल नवरात्रों की तरह नौ दिनों तक मनाई जाती है। गुप्त नवरात्रों में मां भगवती की पूजा की जाती है।
गुप्त नवरात्रों का महत्व चैत्र और शारदीय नवरात्रि से भी ज्यादा होता है क्योंकि गुप्त नवरात्रि में मां दुर्गा शीघ्र प्रसन्न होती हैं। दोस्तों गुप्त नवरात्रि खासतौर से तांत्रिक क्रियाएं शक्ति साधना से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दौरान व्यक्ति ध्यान साधना करके दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति कर सकता है। इस समय में की गई साधना शीघ्र फलदाई होती है।
| इसे भी जाने – करवा चौथ कब है 2026 Karwa Chauth 2026 Date And Time |
आपको बता दें कि गुप्त नवरात्रि की पूजा के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ-साथ 10 महाविद्याओं की भी पूजा होती है। यह 10 महाविद्याएं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमामती, मां बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी है। दोस्तों इस नवरात्रि को करने में सबसे जरूरी बात यह है कि इसमें साधक को पूर्ण संयम और शुद्धता के साथ मां भगवती की आराधना करनी चाहिए। गुप्त नवरात्रों में मां दुर्गा की पूजा की जाती है क्योंकि इस दौरान मां की आराधना गुप्त रूप से की जाती है। इसीलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहा गया है।
दोस्तों सांसारिक लोग इस नवरात्रि को ठीक उसी तरह से मनाएं जिस तरह से वह चैत्र शारदीय या गुप्त मनाते हैं। इस नवरात्रि की शुरुआत भी कलश स्थापना से ही की जाती है। कलश को सुख समृद्धि और ऐश्वर्या तथा सभी प्रकार की मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि कलश के मुख में स्वयं श्री हरि विष्णु जी का वास होता है और कलश के कंठ में रुद्र का और मूल में ब्रह्मा जी का वास होता है और कलश के मध्य में सभी शक्तियां विराजती हैं।
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 कब है: Ashad Gupt Navratri 2026 Date Kab Hai
अब आईये जानते हैं कि साल 2026 में आषाढ़ गुप्त नवरात्रि कब शुरू होगी और कब समाप्त होगी? कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा। दोस्तों साल 2026 में आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 15 जुलाई 2026 दिन बुधवार को होगी और आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की समाप्ति 23 जुलाई 2026 दिन गुरुवार को होगी और प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 14 जुलाई 2026 की दोपहर 3:12 पर हो जाएगी और प्रतिपदा तिथि की समाप्ति 15 जुलाई 2026 की सुबह 11:50 50 पर होगी
कलश स्थापना शुभ मुहूर्त
और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 5:33 से लेकर सुबह 10:09 तक रहेगा। 21 जुलाई 2026 दिन मंगलवार को अष्टमी तिथि रहेगी। इस दिन दुर्गा अष्टमी के साथ-साथ मां महागौरी की पूजा की जाएगी। 22 जुलाई 2026 दिन बुधवार को नवमी तिथि रहेगी। इस दिन मां सिद्धदात्री की पूजा के साथ हवन और कन्या पूजन करें। 23 जुलाई 2026 दिन गुरुवार को नवरात्रि व्रत का पारण करेंगे। चलिए अब इसकी पूजा विधि समझ लें।
गुप्त नवरात्री पूजा विधि
नवरात्रि के प्रथम दिन पूजा स्थल को साफ करके गंगाजल छिड़क कर शुद्ध कर लें। ईशान कोण में माता की चौकी स्थापित करें और कलश की स्थापना करें। सबसे पहले घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश, गंगाजल, अक्षत, जौ, गंगा जी की मिट्टी, नारियल, लाल वस्त्र, अशोक या आम के पत्ते, सुपारी, सिक्का, रोली, मौली और आदि इकट्ठा कर लें। एक साफ मिट्टी के बर्तन में मिट्टी डालकर जौ बोएं। फिर जौ वाले पात्र के ऊपर कलश स्थापित करें।
कलश में गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत, रोली, हल्दी और कुछ फूल डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखकर उसके ऊपर एक नारियल रखें। नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर मौली से बांध दें। घट स्थापित करने के बाद हाथ जोड़कर मां दुर्गा का ध्यान करें और मां के मंत्रों का जप कर माता की मूर्ति या फोटो की स्थापना करें।
अखंड ज्योति जलाने का संकल्प लें और कलश के पास एक दीपक जलाएं। इसके बाद माता की और कलश की विधिवत पूजा करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ प्रतिदिन करें। देवी को हलवा चने और बताशे का भोग लगाएं। अंत में धूप दीपक कपूर से आरती करें। फिर शंखनाद घंटी बजाएं और पूजा में हुई भूलचूक के लिए माफी मांगे। अष्टमी या नवमी को हवन व कन्या भोज का आयोजन करें। इसके बाद ही नवरात्रि व्रत का पारण करें।
